Featureव्यापार

जब भारत को बचाने के लिए गिरवी रखना पड़ा था 67 टन सोना! 1991 के आर्थिक संकट की वो कहानी जिसने बदल दी देश की किस्मत

साल 1991 भारत के आर्थिक इतिहास का सबसे कठिन और सबसे निर्णायक दौर माना जाता है। यह वह समय था जब देश आर्थिक दिवालियापन के कगार पर पहुंच चुका था। विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से खत्म हो रहा था और हालात ऐसे बन गए थे कि भारत के पास केवल कुछ सप्ताह तक जरूरी सामान आयात करने लायक ही डॉलर बचे थे। ऐसे संकट में देश को बचाने के लिए एक ऐसा फैसला लिया गया, जिसे आज भी भारतीय आर्थिक इतिहास का सबसे साहसिक कदम माना जाता है—भारत को अपना सोना गिरवी रखना पड़ा।

यही वह दौर था, जिसके बाद भारत ने आर्थिक सुधारों का रास्ता अपनाया और दुनिया के लिए अपने बाजार खोल दिए। आज भारत दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, लेकिन इस मुकाम तक पहुंचने की शुरुआत 1991 के उसी कठिन दौर से हुई थी।

आखिर क्यों आया था 1991 का आर्थिक संकट?

1991 का संकट किसी एक घटना का परिणाम नहीं था। इसके पीछे कई वर्षों से बन रही आर्थिक चुनौतियां थीं।

मुख्य कारण:

  • 1980 के दशक में लगातार बढ़ता विदेशी कर्ज।
  • सरकार का बढ़ता राजकोषीय घाटा।
  • आयात पर अत्यधिक निर्भरता।
  • 1990 के खाड़ी युद्ध के कारण कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल।
  • लगातार राजनीतिक अस्थिरता और बदलती सरकारें।
  • विदेशी निवेशकों और कर्जदाताओं का भरोसा कमजोर पड़ना।

इन सभी कारणों से भारत का विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से घटने लगा और भुगतान संकट गहराता चला गया।

जब देश के पास बचा था सिर्फ कुछ हफ्तों का विदेशी मुद्रा भंडार

1991 की गर्मियों तक स्थिति बेहद गंभीर हो चुकी थी। भारत के पास केवल कुछ सप्ताह के आयात के लिए ही विदेशी मुद्रा बची थी। यदि तत्काल डॉलर की व्यवस्था नहीं होती, तो पेट्रोलियम, खाद्यान्न और अन्य जरूरी वस्तुओं के आयात पर गंभीर असर पड़ सकता था।

उस समय सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती विदेशी मुद्रा जुटाने की थी।

संकट की घड़ी में काम आया भारत का सोना

हालात इतने खराब हो चुके थे कि सरकार को देश के स्वर्ण भंडार का उपयोग करना पड़ा।

पहले भेजा गया 20 टन सोना

मई 1991 में तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के कार्यकाल में 20 टन सोना विदेश भेजा गया।

इस प्रक्रिया में:

  • स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के माध्यम से सोना यूनियन बैंक ऑफ स्विट्ज़रलैंड को सौंपा गया।
  • इसके बदले भारत को लगभग 200 से 215 मिलियन डॉलर मिले।
  • समझौते में बाद में सोना वापस खरीदने का प्रावधान भी शामिल था।

हालांकि यह राशि तत्काल राहत देने के लिए पर्याप्त नहीं थी।

RBI ने भी गिरवी रखा 46.91 टन सोना

पहले चरण के बाद भी विदेशी मुद्रा संकट पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। इसके बाद भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने अपने स्वर्ण भंडार से 46.91 टन सोना गिरवी रखने का फैसला किया।

यह सोना:

  • बैंक ऑफ इंग्लैंड
  • बैंक ऑफ जापान

के पास गिरवी रखा गया।

इससे भारत को करीब 405 मिलियन डॉलर की विदेशी मुद्रा प्राप्त हुई, जिससे तत्काल भुगतान संकट को टालने में मदद मिली।

बेहद गोपनीय रखा गया पूरा ऑपरेशन

सोना गिरवी रखने की पूरी प्रक्रिया अत्यंत गोपनीय रखी गई थी। सरकार और रिजर्व बैंक नहीं चाहते थे कि इस खबर से अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत की आर्थिक स्थिति को लेकर घबराहट और बढ़े।

बाद में जब आर्थिक स्थिति सुधरी तो भारत ने अपना गिरवी रखा गया सोना वापस हासिल कर लिया।

फिर आया ऐतिहासिक आर्थिक सुधारों का दौर

विदेशी मुद्रा संकट से तत्काल राहत मिलने के बाद जुलाई 1991 में तत्कालीन वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने ऐतिहासिक बजट पेश किया।

इन आर्थिक सुधारों में शामिल थे:

  • अर्थव्यवस्था का उदारीकरण (Liberalisation)
  • निजीकरण (Privatisation)
  • वैश्वीकरण (Globalisation)
  • लाइसेंस राज में कमी
  • विदेशी निवेश को बढ़ावा
  • आयात-निर्यात नियमों में सुधार

इन सुधारों ने भारतीय अर्थव्यवस्था को नई दिशा दी और विकास की गति तेज हुई।

भारत ने क्या सीखा?

1991 के संकट ने भारत को कई महत्वपूर्ण सबक दिए।

  • विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत रखना जरूरी है।
  • अनियंत्रित कर्ज अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ सकता है।
  • आर्थिक सुधार समय की जरूरत होते हैं।
  • वैश्विक परिस्थितियों के लिए मजबूत वित्तीय तैयारी आवश्यक है।
  • मजबूत बैंकिंग और वित्तीय संस्थान संकट से उबरने में अहम भूमिका निभाते हैं।

आज क्यों याद किया जाता है 1991 का संकट?

आज भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, लेकिन इस सफलता की नींव 1991 के कठिन दौर में रखी गई थी। सोना गिरवी रखने का फैसला उस समय मजबूरी जरूर था, लेकिन उसी फैसले ने देश को तत्काल राहत दिलाई और आर्थिक सुधारों के लिए जरूरी समय भी उपलब्ध कराया।

यही वजह है कि 1991 का आर्थिक संकट भारतीय इतिहास में केवल संकट की कहानी नहीं, बल्कि साहस, दूरदर्शिता और बदलाव की शुरुआत के रूप में भी याद किया जाता है। उस दौर ने साबित किया कि कठिन फैसले कभी-कभी किसी देश का भविष्य बदल देते हैं, और भारत इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।

Related Articles

Back to top button