
नई दिल्ली। दिल्ली में सर्दियों के दौरान बढ़ते वायु प्रदूषण से निपटने के लिए रेखा गुप्ता सरकार ने 104 करोड़ रुपये की पायलट परियोजना तैयार की है। इसके तहत राजधानी के 40 चुनिंदा स्थानों पर प्रदूषण कम करने वाली तकनीकों का इस्तेमाल किया जाएगा। परियोजना का उद्देश्य यह पता लगाना है कि इन तकनीकों से स्थानीय स्तर पर हवा की गुणवत्ता में कितना सुधार किया जा सकता है।
दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (DPCC) इस परियोजना की निगरानी कर रही है। योजना के तहत बाजारों, व्यावसायिक क्षेत्रों, बस टर्मिनलों, पर्यटन स्थलों, अस्पतालों और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर अलग-अलग तकनीकों का परीक्षण किया जाएगा।
परियोजना का प्रमुख लक्ष्य पीएम10 और पीएम2.5 जैसे प्रदूषक कणों के स्तर में 20 प्रतिशत तक कमी लाना है। हालांकि, यह निर्धारित लक्ष्य है, हासिल हो चुका परिणाम नहीं। वास्तविक असर का पता सेंसर से मिलने वाले आंकड़ों और परियोजना के मूल्यांकन के बाद ही चलेगा।
₹104 करोड़ की परियोजना में क्या होगा खास?
दिल्ली में सर्दियों के दौरान वायु प्रदूषण बढ़ने की समस्या लंबे समय से चिंता का विषय रही है। सड़क की धूल, वाहनों से निकलने वाला धुआं और अन्य प्रदूषण स्रोत अलग-अलग इलाकों में हवा की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं।
इसी को ध्यान में रखते हुए 40 स्थानों पर प्रदूषण नियंत्रण की तकनीकों को आजमाने की योजना बनाई गई है। परियोजना शुरुआती तौर पर एक साल तक चलेगी।
इस दौरान चयनित स्थानों पर उपकरण लगाए जाएंगे और उनकी मदद से प्रदूषण के स्तर में होने वाले बदलावों का आकलन किया जाएगा।
योजना की प्रमुख बातें इस प्रकार हैं:
- कुल परियोजना बजट: 104 करोड़ रुपये।
- चयनित स्थान: दिल्ली के 40 इलाके।
- शुरुआती अवधि: एक वर्ष।
- लक्ष्य: पीएम10 और पीएम2.5 के स्तर में 20 प्रतिशत तक कमी।
- निगरानी: सेंसर के जरिए हवा की गुणवत्ता से जुड़े आंकड़े जुटाना।
- क्रियान्वयन और निगरानी: दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति की भूमिका।
चांदनी चौक से लोटस टेंपल तक इन सड़कों पर होगा परीक्षण
पायलट परियोजना के तहत दिल्ली की तीन प्रमुख सड़कों के हिस्सों पर भी प्रदूषण कम करने के उपाय आजमाए जाएंगे। इनमें चांदनी चौक मेन मार्केट रोड, लोटस टेंपल रोड और बाबा खड़क सिंह मार्ग शामिल हैं।
इन स्थानों के चयन के पीछे सड़क की धूल और वाहनों से निकलने वाले धुएं जैसे प्रदूषण स्रोतों को प्रमुख वजह माना गया है।
इन सड़कों पर नई तकनीकों के इस्तेमाल से यह समझने में मदद मिल सकती है कि सीमित क्षेत्र में प्रदूषण नियंत्रण के उपाय कितने प्रभावी साबित होते हैं।
यदि परीक्षण के दौरान प्रदूषण के स्तर में अपेक्षित कमी दर्ज होती है, तो संबंधित तकनीकों की उपयोगिता का आगे मूल्यांकन किया जा सकेगा। हालांकि, किसी तकनीक को सफल मानने के लिए नियमित आंकड़ों और वैज्ञानिक आकलन की जरूरत होगी।
दिल्ली के इन प्रमुख इलाकों में आजमाई जाएंगी तकनीकें
परियोजना के लिए ऐसे सार्वजनिक और व्यावसायिक स्थानों को चुना गया है, जहां स्थानीय स्तर पर प्रदूषण कम करने के उपाय लागू किए जा सकते हैं।
चयनित स्थानों में शामिल प्रमुख इलाके हैं:
- बाजार और व्यावसायिक क्षेत्र: खान मार्केट, कनॉट प्लेस और डिफेंस कॉलोनी।
- पर्यटन और सार्वजनिक स्थल: कनॉट प्लेस का सेंट्रल पार्क, इंडिया गेट के पास चिल्ड्रन्स पार्क और लोटस टेंपल का गलियारा।
- परिवहन केंद्र: कश्मीरी गेट, आनंद विहार और सराय काले खां के अंतरराज्यीय बस टर्मिनल।
- अस्पताल: जीबी पंत अस्पताल और दीन दयाल उपाध्याय अस्पताल सहित चार अस्पताल।
- शिक्षण संस्थान: दिल्ली विश्वविद्यालय की आर्ट्स फैकल्टी।
इसके अलावा मध्य और दक्षिण दिल्ली के कई स्थानों को भी इस योजना में शामिल किए जाने की जानकारी दी गई है।
इन इलाकों में अलग-अलग परिस्थितियों के अनुसार प्रदूषण नियंत्रण तकनीकों का परीक्षण किया जाएगा, ताकि उनके प्रभाव का आकलन किया जा सके।
40 स्थानों को पांच श्रेणियों में बांटा गया
पायलट परियोजना के तहत चुने गए 40 स्थानों को पांच श्रेणियों में बांटने की योजना है। इनमें बाजार, व्यावसायिक क्षेत्र, परिवहन केंद्र, पर्यटन स्थल तथा अस्पताल और शिक्षण संस्थानों से जुड़े स्थान शामिल हैं।
उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, कुल 40 स्थानों में से 29 व्यावसायिक क्षेत्रों से संबंधित हैं। यानी कुल चयनित स्थानों में इनकी हिस्सेदारी 72.5 प्रतिशत है।
प्रत्येक स्थान का क्षेत्रफल लगभग एक से डेढ़ एकड़ के बीच बताया गया है। इससे सीमित क्षेत्र में उपकरणों के प्रभाव का अध्ययन करने और अलग-अलग स्थानों के आंकड़ों की तुलना करने में मदद मिल सकती है।
सेंसर से होगी प्रदूषण की निगरानी
इस परियोजना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हवा की गुणवत्ता की लगातार निगरानी करना है। इसके लिए चयनित स्थानों पर सेंसर लगाए जाएंगे, जो रोजाना प्रदूषण से संबंधित आंकड़े दर्ज करेंगे।
दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति इन आंकड़ों की निगरानी करेगी। इनकी मदद से यह समझने की कोशिश की जाएगी कि संबंधित स्थानों पर प्रदूषण नियंत्रण के उपाय लागू करने के बाद पीएम10 और पीएम2.5 के स्तर में क्या बदलाव आया।
पीएम10 और पीएम2.5 हवा में मौजूद सूक्ष्म कणों के दो प्रमुख माप हैं। पीएम2.5 के कण आकार में और छोटे होते हैं, इसलिए वे श्वसन तंत्र के भीतर गहराई तक पहुंच सकते हैं। इनका अधिक स्तर स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा कर सकता है।
सेंसर से प्राप्त आंकड़ों का मूल्यांकन यह समझने में भी मदद कर सकता है कि प्रदूषण में होने वाला बदलाव इस्तेमाल की गई तकनीक से संबंधित है या मौसम और अन्य परिस्थितियों से प्रभावित है।
कंपनियों को उपकरण लगाने के लिए मिलेंगे चार सप्ताह
योजना के तहत संबंधित स्थान सौंपे जाने के बाद कंपनियों को उपकरण लगाने और उन्हें चालू करने के लिए चार सप्ताह का समय दिए जाने की जानकारी है।
इसके बाद उपकरणों के संचालन और प्रदूषण स्तर पर उनके प्रभाव का मूल्यांकन किया जाएगा। परियोजना की तकनीकी समीक्षा के दौरान यह भी महत्वपूर्ण होगा कि उपकरण नियमित रूप से काम करें और उनसे प्राप्त आंकड़े भरोसेमंद हों।
चूंकि योजना शुरुआती तौर पर एक वर्ष के लिए है, इसलिए इसके परिणामों का आकलन निर्धारित अवधि के आंकड़ों के आधार पर किया जाना चाहिए।
क्या दिल्ली की हवा में 20 प्रतिशत तक सुधार होगा?
परियोजना के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इन तकनीकों से वास्तव में प्रदूषण का स्तर 20 प्रतिशत तक घटाया जा सकेगा।
फिलहाल यह परियोजना का लक्ष्य है। इसे हासिल करने के लिए तकनीक की प्रभावशीलता, उपकरणों का सही संचालन और संबंधित स्थानों पर प्रदूषण के प्रमुख स्रोतों को समझना जरूरी होगा।
यह भी ध्यान रखना होगा कि किसी एक स्थान पर प्रदूषण कम होने का मतलब पूरी दिल्ली की हवा में उतनी ही कमी आना नहीं है। शहर की वायु गुणवत्ता पर वाहनों, निर्माण कार्यों, सड़क की धूल, मौसम और क्षेत्रीय प्रदूषण स्रोतों का संयुक्त प्रभाव पड़ता है।
इसलिए परियोजना के परिणामों को समझने के लिए स्थानीय स्तर के आंकड़ों के साथ व्यापक वायु गुणवत्ता की स्थिति पर भी नजर रखनी होगी।
दिल्ली के प्रदूषण नियंत्रण में क्यों अहम है यह योजना?
दिल्ली में सर्दियों के दौरान प्रदूषण बढ़ने पर लोगों को सांस लेने में परेशानी और अन्य स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में प्रदूषण के प्रमुख स्रोतों पर नियंत्रण के साथ नई तकनीकों की प्रभावशीलता जांचना भी महत्वपूर्ण है।
104 करोड़ रुपये की इस पायलट परियोजना के जरिए 40 स्थानों पर अलग-अलग उपायों का परीक्षण किया जाएगा। इससे यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि स्थानीय परिस्थितियों में कौन-से उपाय उपयोगी हैं और किन क्षेत्रों में अतिरिक्त कदम उठाने की जरूरत है।



