
पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर नंदीग्राम सुर्खियों में है। कभी तृणमूल कांग्रेस (TMC) के आंदोलन और राजनीतिक संघर्ष का बड़ा केंद्र रहा यह इलाका अब पार्टी के लिए नई चुनौती बनता दिखाई दे रहा है। नंदीग्राम सीट पर 6 अक्टूबर को उपचुनाव होना है, लेकिन चुनाव से पहले ही उम्मीदवार को लेकर पार्टी के सामने मुश्किलें खड़ी होने की चर्चा शुरू हो गई है।
सबसे ज्यादा चर्चा इसलिए हो रही है क्योंकि TMC के एक वरिष्ठ नेता ने इस सीट से चुनाव लड़ने में अपनी अनिच्छा जाहिर कर दी है। उन्होंने यहां तक कहा कि अगर पार्टी उन्हें उम्मीदवार बनाने का फैसला करती है, तब भी वह चुनाव लड़ने से इनकार कर देंगे।
ऐसे में राजनीतिक गलियारों में सवाल उठ रहा है कि क्या नंदीग्राम में TMC की स्थिति फाल्टा जैसी होने जा रही है?

फाल्टा में आखिरी वक्त पर लगा था बड़ा झटका
करीब तीन महीने पहले फाल्टा विधानसभा सीट पर भी TMC को इसी तरह की मुश्किल का सामना करना पड़ा था। मतदान से ठीक दो दिन पहले पार्टी के बाहुबली उम्मीदवार जहांगीर खान उर्फ ‘पुष्पा’ ने अपना नामांकन वापस ले लिया था।
इसके बाद मुकाबला कांग्रेस, भाजपा और लेफ्ट के बीच रह गया और अंततः भाजपा ने सीट पर जीत दर्ज की।
फाल्टा सीट TMC के लिए इसलिए भी अहम थी क्योंकि यह डायमंड हार्बर लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है, जहां पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी सांसद हैं। 2011 से यह क्षेत्र TMC का मजबूत गढ़ माना जाता रहा था।
उम्मीद थी कि जहांगीर खान पार्टी की स्थिति मजबूत रखेंगे, लेकिन नाम वापसी ने पूरा समीकरण बदल दिया।
अब नंदीग्राम में क्यों बढ़ी चिंता?
नंदीग्राम का मामला फिलहाल फाल्टा जितना गंभीर नहीं है। चुनाव में अभी समय है और पार्टी की ओर से उम्मीदवार को लेकर कोई अंतिम आधिकारिक घोषणा सामने नहीं आई है। इसके बावजूद कुछ घटनाक्रमों ने राजनीतिक अटकलों को जरूर हवा दे दी है।
पहला संकेत मंगलवार को हुई डीएम की सर्वदलीय बैठक से मिला। बैठक में लगभग सभी प्रमुख दलों के प्रतिनिधि पहुंचे, लेकिन TMC के प्रतिनिधित्व को लेकर चर्चा शुरू हो गई। इसके बाद सवाल उठने लगा कि क्या पार्टी नंदीग्राम उपचुनाव को लेकर किसी रणनीतिक असमंजस में है।
दूसरा और ज्यादा अहम संकेत TMC के वरिष्ठ नेता अबू ताहेर के बयान से मिला।
‘ममता बनर्जी को खुद चुनाव लड़ना चाहिए, मैं क्यों लड़ूं?’
अबू ताहेर ने नंदीग्राम से चुनाव लड़ने की संभावना पर स्पष्ट तौर पर असहमति जताई है। उनका कहना है कि अगर पार्टी को नंदीग्राम में मजबूत उम्मीदवार उतारना है तो ममता बनर्जी को खुद चुनाव लड़ना चाहिए।
उन्होंने सवाल उठाया कि इतने वर्षों तक पार्टी के साथ रहने के बावजूद उन्हें कभी उम्मीदवार के तौर पर प्राथमिकता नहीं दी गई, तो अब उन्हें चुनाव लड़ने के लिए क्यों कहा जा रहा है?
उनके बयान का सार यह है कि वह खुद को किसी राजनीतिक ‘बलि का बकरा’ के तौर पर इस्तेमाल किए जाने के पक्ष में नहीं हैं।
उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि यदि पार्टी की ओर से उन्हें चुनाव लड़ने के लिए कहा भी जाता है, तब भी वह इस चुनाव से दूरी बनाए रखेंगे।
ममता बनर्जी के लिए नंदीग्राम क्यों है बेहद खास?
नंदीग्राम सिर्फ एक विधानसभा सीट नहीं है, बल्कि ममता बनर्जी की राजनीतिक यात्रा से गहराई से जुड़ा हुआ क्षेत्र है।
2007 के भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन ने नंदीग्राम को पूरे देश में चर्चा में ला दिया था। इस आंदोलन में ममता बनर्जी की भूमिका ने TMC को पश्चिम बंगाल की राजनीति में मजबूत आधार देने में अहम भूमिका निभाई।
इसके बाद 2021 का विधानसभा चुनाव नंदीग्राम को और भी हाई-प्रोफाइल बना गया। उस चुनाव में ममता बनर्जी का मुकाबला उनके पूर्व करीबी और भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी से हुआ था। शुभेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को बेहद करीबी मुकाबले में हराया था।
2026 के विधानसभा चुनाव में भी यह सीट भाजपा के लिए मजबूत बनी रही और शुभेंदु अधिकारी ने यहां से जीत दर्ज की।
यही वजह है कि नंदीग्राम में होने वाला उपचुनाव TMC और भाजपा दोनों के लिए प्रतिष्ठा की लड़ाई माना जा रहा है।
TMC में गुटबाजी भी बढ़ा रही मुश्किल?
नंदीग्राम को लेकर चिंता के बीच TMC के भीतर कथित गुटबाजी की चर्चा भी सामने आ रही है। पार्टी के विधायक दल में दो अलग-अलग धड़ों की बात कही जा रही है।
एक धड़े की अगुवाई ऋताब्रत बनर्जी कर रहे हैं, जबकि दूसरे धड़े को कालीघाट TMC के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न अभी भी ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट के पास है।
ऐसे में नंदीग्राम उपचुनाव सिर्फ एक सीट का चुनाव नहीं रह गया है। यह TMC के संगठनात्मक प्रभाव, स्थानीय नेतृत्व और पार्टी की चुनावी रणनीति की भी परीक्षा बन सकता है।
फाल्टा जैसी स्थिति से बच पाएगी TMC?
फाल्टा में मतदान से ठीक पहले उम्मीदवार के नाम वापस लेने के बाद पार्टी को बड़ा राजनीतिक झटका लगा था। अब नंदीग्राम में भी वरिष्ठ नेता के चुनाव लड़ने से इनकार करने की खबरों ने सवाल खड़े कर दिए हैं।
हालांकि, दोनों मामलों में बड़ा अंतर यह है कि नंदीग्राम में अभी किसी उम्मीदवार ने आधिकारिक तौर पर नाम वापस नहीं लिया है और TMC ने भी उम्मीदवार चयन को लेकर किसी संकट की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।
इसलिए फिलहाल फाल्टा जैसी स्थिति को लेकर लगाई जा रही बातें राजनीतिक अटकलें ही हैं।
लेकिन इतना जरूर है कि 6 अक्टूबर का नंदीग्राम उपचुनाव ममता बनर्जी की पार्टी के लिए बेहद महत्वपूर्ण होने वाला है। उम्मीदवार कौन होगा, पार्टी के भीतर असंतोष कितना है और भाजपा इस मौके को किस तरह भुनाती है—इन सवालों के जवाब चुनावी तस्वीर को काफी हद तक तय कर सकते हैं।



