
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के चर्चित सर्पदंश मुआवजा घोटाला मामले में जांच के बीच बड़ा मोड़ सामने आया है। इस मामले के कथित मास्टरमाइंड अधिवक्ता श्रवण वस्त्रकार लकवा (पक्षाघात) से पीड़ित हो गए हैं। उनकी गंभीर स्वास्थ्य स्थिति के कारण पुलिस उनका बयान दर्ज नहीं कर पा रही है, जिससे पूरे मामले की जांच प्रभावित हो रही है।
सिटी कोतवाली, तोरवा और कोनी थाना पुलिस अब गिरोह के अन्य सदस्यों तक पहुंचने के लिए कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR), बैंक खातों के लेनदेन और डिजिटल साक्ष्यों की गहन जांच में जुटी है।
431 मामलों में 17.24 करोड़ रुपये के फर्जी मुआवजे का आरोप
पुलिस जांच के अनुसार वर्ष 2022 से 2025 के बीच सर्पदंश से मौत के नाम पर 431 मामलों में करीब 17.24 करोड़ रुपये की सहायता राशि स्वीकृत की गई थी।
आरोप है कि इनमें बड़ी संख्या में सामान्य मौतों को फर्जी दस्तावेजों के जरिए सर्पदंश से हुई मौत दिखाया गया और आरबीसी 6-4 के तहत प्रति प्रकरण 4 लाख रुपये का मुआवजा मंजूर कराया गया।
मामले की जांच अभी जारी है और इन आरोपों की न्यायिक पुष्टि होना बाकी है।
ऐसे काम करता था कथित फर्जीवाड़े का नेटवर्क
जांच एजेंसियों के मुताबिक, कथित तौर पर पूरा नेटवर्क बेहद सुनियोजित तरीके से काम करता था।
पुलिस के अनुसार:
- सूचना के अधिकार (RTI) के जरिए सामान्य मौतों से जुड़े मर्ग दस्तावेज प्राप्त किए जाते थे।
- कथित रूप से फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट तैयार की जाती थी।
- नकली शासकीय सील लगाकर मौत का कारण सर्पदंश दर्शाया जाता था।
- दस्तावेजों के आधार पर मुआवजा स्वीकृत कराया जाता था।
- राशि मिलने के बाद कथित तौर पर गिरोह के सदस्यों के बीच उसका बंटवारा किया जाता था।
लेनदेन के मिले प्रारंभिक साक्ष्य
जांच में पुलिस को दो मामलों में ऐसे साक्ष्य मिले हैं, जिनके अनुसार कथित तौर पर अधिवक्ता श्रवण वस्त्रकार को 1.70 लाख रुपये और 1.75 लाख रुपये प्राप्त हुए थे।
पुलिस का दावा है कि जांच में यह भी सामने आया है कि:
- कथित फर्जी दस्तावेज तैयार करने वाले डॉक्टर को लगभग 50 हजार रुपये दिए जाते थे।
- सूचना उपलब्ध कराने वाले कुछ कर्मचारियों को 3 से 5 हजार रुपये तक मिलते थे।
- फाइल आगे बढ़ाने वाले कुछ लिपिकों और अन्य संबंधित कर्मचारियों की भूमिका की भी जांच की जा रही है।
इन दावों की पुष्टि जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगी।
गिरफ्तारी से पहले लकवे की स्थिति में मिला आरोपी
पुलिस जब श्रवण वस्त्रकार को गिरफ्तार करने पेंडारी गांव पहुंची तो वह लकवे से पीड़ित हालत में चारपाई पर मिला।
परिजनों के अनुसार:
- उसे पक्षाघात हुआ है।
- शरीर का एक हिस्सा काम नहीं करता।
- वह स्पष्ट रूप से बोल भी नहीं पा रहा है।
- उसका इलाज रायपुर स्थित एम्स में भी कराया गया है।
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि मौजूदा स्वास्थ्य स्थिति में न तो उसका मेमोरेंडम दर्ज किया जा सकता है और न ही उसके कथित खुलासे के आधार पर दस्तावेज या अन्य सामग्री बरामद की जा सकती है।
फॉरेंसिक विभाग भी जांच के दायरे में
जांच के दौरान सिम्स के फॉरेंसिक विभाग की भूमिका भी जांच के दायरे में आ गई है।
अब तक:
- एक महिला डॉक्टर को गिरफ्तार कर जेल भेजा जा चुका है।
- एक अन्य डॉक्टर अवकाश पर होने के कारण पुलिस की पहुंच से बाहर बताया जा रहा है।
- कुछ अन्य डॉक्टरों और कर्मचारियों की भूमिका की भी जांच जारी है।
मॉर्च्युरी में बढ़ाई गई सुरक्षा
घोटाले के सामने आने के बाद सिम्स प्रशासन ने मॉर्च्युरी की सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी है।
अब:
- मॉर्च्युरी परिसर में तीन सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं।
- बिना अनुमति किसी भी व्यक्ति के प्रवेश पर रोक लगाई गई है।
- पोस्टमार्टम रिपोर्ट तैयार करने में लापरवाही या अनियमितता पर सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं।
डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर आगे बढ़ रही जांच
पुलिस का कहना है कि अब तक इस मामले में डॉक्टरों, अधिवक्ताओं, पुलिसकर्मियों, निजी व्यक्तियों और राजस्व विभाग से जुड़े कई लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है।
इसके अलावा एसडीएम कार्यालय, तहसील कार्यालय और अन्य संबंधित अधिकारियों की भूमिका की भी जांच जारी है। पुलिस डिजिटल रिकॉर्ड, बैंक लेनदेन और कॉल डिटेल के आधार पर पूरे नेटवर्क की कड़ियां जोड़ने का प्रयास कर रही है।
मुख्य बातें
- सर्पदंश मुआवजा घोटाले के कथित मास्टरमाइंड श्रवण वस्त्रकार लकवे से पीड़ित।
- स्वास्थ्य कारणों से पुलिस उनका बयान दर्ज नहीं कर पा रही।
- 2022–2025 के बीच 431 मामलों में 17.24 करोड़ रुपये के मुआवजे की जांच।
- सामान्य मौतों को कथित रूप से सर्पदंश बताकर फर्जी दस्तावेज तैयार करने का आरोप।
- डॉक्टरों, अधिवक्ताओं, पुलिसकर्मियों और अन्य कर्मचारियों की भूमिका की जांच जारी।
- पुलिस कॉल डिटेल, बैंक खातों और डिजिटल साक्ष्यों के जरिए पूरे नेटवर्क की पड़ताल कर रही है।
नोट: यह मामला जांच के अधीन है। समाचार में उल्लिखित आरोप पुलिस जांच पर आधारित हैं। अंतिम निष्कर्ष न्यायालय में सुनवाई और न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही तय होगा।



