
नई दिल्ली। त्योहारी सीजन शुरू होने से पहले सोना और चांदी खरीदने वालों के लिए बड़ी खबर सामने आई है। केंद्र सरकार सोना-चांदी पर लगने वाली इंपोर्ट ड्यूटी यानी आयात शुल्क में कटौती करने के विकल्प पर विचार कर सकती है। अगर सरकार ऐसा फैसला लेती है तो इसका असर घरेलू बाजार में सोने और चांदी की कीमतों पर देखने को मिल सकता है।
हालांकि, अभी इस संबंध में कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि आने वाले दिनों में सोना-चांदी निश्चित रूप से सस्ता हो जाएगा। फिलहाल उद्योग जगत की ओर से सरकार से आयात शुल्क कम करने की मांग और संभावित नीति बदलाव की चर्चा तेज है।
क्यों घट सकती है इंपोर्ट ड्यूटी?
जेम्स एंड ज्वेलरी काउंसिल के चेयरमैन राजेश रोकड़े के मुताबिक, सोने और चांदी पर ऊंचे टैक्स रेट आयात को नियंत्रित करने के अपने उद्देश्य में अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाए हैं।

इंडस्ट्री का तर्क है कि आयात शुल्क बढ़ने के बावजूद देश में सोने की मांग में बड़ी कमी नहीं आई। इसके बजाय महंगे आधिकारिक आयात और घरेलू मांग के बीच अंतर का फायदा अवैध कारोबार करने वालों को मिला।
यही वजह है कि अब सरकार की ओर से मौजूदा टैक्स व्यवस्था की समीक्षा किए जाने की संभावना जताई जा रही है।
उद्योग जगत की प्रमुख चिंताएं
- ऊंचे आयात शुल्क से आधिकारिक बाजार में सोना महंगा होता है।
- घरेलू मांग पूरी तरह खत्म नहीं होती।
- कीमतों में अंतर बढ़ने पर अवैध कारोबार को बढ़ावा मिल सकता है।
- ज्वेलरी कारोबार पर लागत का दबाव बढ़ता है।
- त्योहारी और शादी के सीजन में मांग प्रभावित होने की आशंका रहती है।
पहले भी सरकार को दी गई थी चेतावनी
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, जब सोने पर आयात शुल्क बढ़ाया गया था, तब ज्वेलरी इंडस्ट्री ने सरकार के सामने अपनी चिंता रखी थी। इंडस्ट्री का कहना था कि बहुत ज्यादा टैक्स लगाने से आधिकारिक आयात को हतोत्साहित करने के बजाय ग्रे मार्केट और तस्करी को बढ़ावा मिल सकता है।
जेम्स एंड ज्वेलरी काउंसिल की ओर से भी इसी तरह की चिंता जताई गई है। संगठन का मानना है कि टैक्स व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिससे वैध कारोबार प्रतिस्पर्धी बना रहे और सरकार को राजस्व भी मिलता रहे।
मई में बढ़ाया गया था कस्टम ड्यूटी का बोझ
दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, इसी साल मई में केंद्र सरकार ने सोने और चांदी पर कस्टम ड्यूटी को 6 फीसदी से बढ़ाकर 15 फीसदी कर दिया था। उस समय इस बदलाव को आयात को नियंत्रित करने और विदेशी मुद्रा पर दबाव कम करने से जोड़कर देखा गया था।
अब यदि सरकार आयात शुल्क में कटौती करती है तो ज्वेलरी उद्योग और ग्राहकों दोनों को राहत मिलने की उम्मीद की जा सकती है।
हालांकि, सोने-चांदी की खुदरा कीमत केवल इंपोर्ट ड्यूटी से तय नहीं होती। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत, डॉलर-रुपये की विनिमय दर, घरेलू टैक्स, स्थानीय प्रीमियम और बाजार की मांग जैसे कई दूसरे कारक भी कीमतों को प्रभावित करते हैं।
भारत में सोने की मांग क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत दुनिया के सबसे बड़े सोना उपभोक्ता देशों में शामिल है। देश में हर साल बड़ी मात्रा में सोने का आयात किया जाता है। इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से ज्वेलरी के साथ-साथ निवेश के लिए भी किया जाता है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का सोने का आयात मूल्य के लिहाज से 24 फीसदी बढ़कर 71.9 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। हालांकि मात्रा के लिहाज से आयात घटकर करीब 721 टन रहा।
इसका मतलब यह है कि आयात की मात्रा कम होने के बावजूद अंतरराष्ट्रीय कीमतों में बढ़ोतरी के कारण भारत पर आयात बिल का दबाव बना रहा।
ग्राहकों को क्या फायदा हो सकता है?
अगर केंद्र सरकार वास्तव में इंपोर्ट ड्यूटी घटाती है और बाकी बाजार परिस्थितियां अनुकूल रहती हैं, तो सोने और चांदी की घरेलू कीमतों पर इसका दबाव कम हो सकता है।
खासकर त्योहारी और शादी के सीजन में ज्वेलरी खरीदने वाले ग्राहकों के लिए यह राहत की खबर हो सकती है।
लेकिन फिलहाल इसे संभावित फैसला ही माना जाना चाहिए। सरकार की ओर से आधिकारिक घोषणा होने तक यह तय नहीं है कि आयात शुल्क कितना घटेगा, कब घटेगा और इसका खुदरा कीमतों पर कितना असर पड़ेगा।
सोना खरीदने वालों की नजर अब सरकार के फैसले पर
त्योहारी सीजन में सोने-चांदी की मांग आमतौर पर बढ़ती है। ऐसे में इंपोर्ट ड्यूटी को लेकर सरकार का कोई भी फैसला ज्वेलरी बाजार और ग्राहकों दोनों के लिए महत्वपूर्ण होगा।
अब बाजार की नजर इस बात पर है कि सरकार आयात शुल्क में वास्तव में कोई बदलाव करती है या नहीं। अगर कटौती का फैसला होता है, तो उसकी घोषणा के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि ग्राहकों को सोना और चांदी खरीदने में कितनी राहत मिल सकती है।



